शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी: दूसरे देश दरवाज़े बंद कर रहे, भारत Global South के छात्रों की पसंद बन सकता है
केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने 9 अक्टूबर को नई दिल्ली में FICCI के 21वें Higher Education Summit में कहा कि जब कई देश विदेशी छात्रों के लिए नियम सख़्त कर रहे हैं, तब भारत के पास Global South के छात्रों के लिए पसंदीदा शिक्षा गंतव्य बनने का "real opportunity" है। उन्होंने उद्योग से पाठ्यक्रम बनाने में भागीदारी की अपील की।
ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों में वीज़ा नियम सख़्त होने के बीच भारत सरकार इसे अवसर के रूप में देख रही है।
शिक्षा मंत्री ने क्या कहा
- "India has a real opportunity to become a preferred education destination."
- उद्योग सिर्फ़ भर्ती तक सीमित न रहे; "work with universities to design curricula"।
- उद्योग शोधकर्ताओं की मदद करे, apprenticeship दे और असली उद्योग समस्याएँ प्रयोगशालाओं तक लाए।
- सरकार, विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल हो।
शिक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव के सुझाव
अतिरिक्त सचिव आनंदराव पाटिल ने कहा कि "Countries that once welcomed international students are tightening their doors." उनके सुझाव:
| सुझाव | विवरण |
|---|---|
| विदेशी कैंपस | सिर्फ़ पढ़ाने के बजाय रिसर्च और academic साझेदारी पर ध्यान |
| संसाधन साझा करना | कम इस्तेमाल हो रही labs, faculty programmes और digital platforms राज्य विश्वविद्यालयों से साझा करना |
| स्कूली छात्र | विश्वविद्यालय साल में कम से कम 100 दिन स्कूली छात्रों, ख़ासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के छात्रों, की मेज़बानी करें |
| सुधार लागू करना | ज़िम्मेदारी तय हो, बदलाव क्रम से हों और data की नियमित समीक्षा हो |
संदर्भ
रिपोर्ट के मुताबिक इंग्लैंड के 10 में से 4 से ज़्यादा विश्वविद्यालय इस साल घाटे की आशंका जता रहे हैं, क्योंकि विदेशी छात्रों की संख्या घट रही है। जुलाई से लागू भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के बाद करीब 10 ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के भारत में कैंपस खोलने की उम्मीद है।
स्रोत: Business Standard
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रह्लाद जोशी ने यह बात कहाँ कही?
9 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में FICCI के 21वें Higher Education Summit में।
विश्वविद्यालयों को स्कूली छात्रों के लिए क्या सुझाव दिया गया?
साल में कम से कम 100 दिन स्कूली छात्रों, ख़ासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के, की मेज़बानी।
